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एक प्रकृतिवादी के रूप में श्री अरविन्द ज्ञान-प्राप्ति में इन्द्रियों के महत्त्व को स्वीकार करते हैं. उनके अनुसार दृष्टि, श्रव, घ्रा, स्पर्श, स्वाद और मस्तिष्क या मन--ये छ: इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में सहायक होती हैं. मन के अतिरिक्त अन्य सभी इन्द्रियाँ अपनी क्रियाओं के लिए क्रमश: नेत्र, कर्, वासिका, त्वचा और जिह्वा--इन शारीरिक अवयवों पर निर्भर होती हैं. अत: इन इन्द्रियों का प्रशिक्ष करना शिक्षा का एक बहुत बड़ा कार्य है. महर्षि अरविन्द के अनुसार, शिक्षक केवल निर्देशक है. उसे बालक को केवल ज्ञान प्राप्ति की विधि से परिचित कराना है क्योंकि बालक स्वत: ज्ञान प्राप्त कर लेगा.